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खास खबर: वातावरण से कार्बन कैसे हटायेंगे, IPCC रिपोर्ट में वैज्ञानिक बताएंगे

Mohan Chandra Joshi March 26, 2022
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  • Climate- वातावरण से कार्बन कैसे हटायेंगे, IPCC रिपोर्ट में वैज्ञानिक बताएँगे

नई दिल्ली। IPCC ने अब तक बढ़ते तापमान के कारणों, चुनौतियों और प्रभावों का विवरण देने वाली रिपोर्ट के दो सेट जारी किए हैं

जहाँ एक ओर जलवायु परिवर्तन लगातार अपनी गति पर बढ़ रहा है और स्थिति बिगाड़ रहा है, वहीँ एक बार फिर संयुक्त राष्ट्र का अंतर सरकारी पैनल (IPCC) जलवायु परिवर्तन पर एक महत्वपूर्ण रिपोर्ट जारी करने के लिए तैयार है।
इस आगामी रिपोर्ट में इस बात पर ध्यान केंद्रित किया गया है कि कैसे बिगड़ती स्थिति को संभाला जाए। इस रिपोर्ट से उम्मीद है कि इसमें विशेषज्ञों द्वारा उन प्रौद्योगिकियों पर विचार किया जायेगा जो उस कार्बन डाइऑक्साइड को हटाने में मदद कर सकती हैं जो पृथ्वी के गर्म होने के लिए जिम्मेदार है।
छठी मूल्यांकन रिपोर्ट की तीसरी किस्त में न केवल विशेषज्ञों की सहभागिता होगी, बल्कि इसमें दुनिया भर के नेता भी शामिल होंगे, क्योंकि उन्हें पैनल द्वारा 4 अप्रैल को इसे जारी करने के बाद इसका अनुमोदन और इस दस्तावेज़ पर हस्ताक्षर करना होगा।
IPCC ने अब तक बढ़ते तापमान के कारणों, चुनौतियों और प्रभावों का विवरण देने वाली रिपोर्ट के दो सेट जारी किए हैं। जहाँ पहली रिपोर्ट ने दिखाया कि जब तक ग्रीनहाउस गैस उत्सर्जन में तत्काल, तीव्र और बड़े पैमाने पर कमी नहीं होती है, तब तक वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस से 2 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करना पहुंच से बाहर होगा, वहीँ दूसरी रिपोर्ट में पाया गया कि मानव-प्रेरित जलवायु परिवर्तन है प्रकृति में खतरनाक और व्यापक व्यवधान पैदा कर रहा है। यह दुनिया भर में अरबों लोगों के जीवन को प्रभावित कर रहा है और कार्रवाई की खिड़की कम होती जा रही है।
अपनी प्रतिक्रिया देते हुए तीसरी रिपोर्ट के लिए एक समन्वय प्रमुख लेखक (CLA) और सेंटर फॉर पॉलिसी रिसर्च के प्रोफेसर नवरोज़ के. दुबाश कहते हैं कि आईपीसीसी वर्किंग ग्रुप 3 की रिपोर्ट के आगे सबसे बड़ी चुनौती होगी रिसर्च का आकलन करना और नीति निर्माताओं को जलवायु परिवर्तन की चुनौती के तत्काल समाधान के लिए मार्गदर्शन करना।
प्रोफेसर नवरोज कहते हैं, “भारत निश्चित रूप से गंभीर जलवायु नुकसान के जोखिम का सामना कर रहा है और यह नुक्सान हमारी विकास संभावनाओं को प्रभावित करेगा।”
कुल मिलाकर यह तीसरी रिपोर्ट जलवायु परिवर्तन के सबसे बुरे प्रभावों से बचने के लिए शमन कार्रवाई में तेजी लाने के लिए सरकारें कैसे जुटा सकती हैं, इसके लिए आगे का रास्ता बताएगी।
क्या पाया अब तक की आईपीसीसी की रिपोर्टों ने?
संयुक्त राष्ट्र संघ ने पिछले आठ महीनों में दो रिपोर्टें जारी की हैं जिनमें पाया गया है कि जलवायु परिवर्तन न केवल दुनिया के लिए बल्कि पूरे ग्रह के लिए सबसे बड़े खतरों में से एक के रूप में उभर रहा है। पिछले साल अगस्त में जारी अपनी पहली रिपोर्ट में, पैनल ने जलवायु के चरम पर पहुंचने पर चिंता व्यक्त की।
विभिन्न प्रकार के परिदृश्यों में चरम घटनाओं की संभावना को बढ़ाते हुए, संयुक्त राष्ट्र के पैनल ने कहा कि, ग्लोबल वार्मिंग अगर 1.5 डिग्री सेल्सियस तक होता है तो गर्मी की लहरें, लंबे गर्म मौसम और कम समय के लिए ठंड के मौसम में वृद्धि होगी। लेकिन ग्लोबल वार्मिंग अगर दो डिग्री सेल्सियस तक पहुँचती है तो वो असहनीय होगा।
पिछले महीने जारी रिपोर्ट के दूसरे भाग से पता चला है कि यदि मानव-जनित ग्लोबल वार्मिंग एक डिग्री के दसवें हिस्से तक सीमित नहीं होती है, तो पृथ्वी नियमित रूप से घातक गर्मी, आग, बाढ़ और भविष्य के दशकों में सूखे से प्रभावित होगी और 127 तरीकों से “संभावित रूप से अपरिवर्तनीय” नुकसान अनुभव करेगी हैं।
यह रिपोर्टें इस बात पर प्रकाश डालती हैं कि जलवायु परिवर्तन कैसे वैश्विक प्रवृत्तियों, जैसे प्राकृतिक संसाधनों के निरंतर उपयोग, बढ़ते शहरीकरण, सामाजिक असमानताओं, चरम घटनाओं से नुकसान और क्षति, और भविष्य के विकास को खतरे में डालने वाली महामारी के साथ तालमेल बैठाता है।

अगले पाँच सालों में पूरी दुनिया के पास होगा जलवायु परिवर्तन का अर्लि वार्निंग सिस्टम

संयुक्त राष्ट्र के प्रमुख ने बुधवार को एक ऐसी परियोजना की घोषणा की, जिसमें पृथ्वी पर मौजूद प्रत्येक व्यक्ति के लिए अगले पांच साल में अर्लि वेदर वार्निंग सिस्टम, या मौसम-चेतावनी प्रणाली, तक पहुँच सुनिश्चित की जाएगी। ऐसा करना अब इसलिए ज़रूरी हो गया है क्योंकि जलवायु परिवर्तन के कारण प्राकृतिक आपदाएं न सिर्फ अधिक शक्तिशाली हो गई हैं, उनकी आवृति भी बढ़ गयी है।

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इस योजना की घोषणा करते हुए संयुक्त राष्ट्र महासचिव एंटोनियो गुटेरेस ने कहा कि जिनेवा स्थित विश्व मौसम विज्ञान संगठन के सहयोग से इस परियोजना का क्रियान्वयन होगा और इसका उद्देश्य होगा समृद्ध देशों द्वारा प्रयोग की जा रही ऐसी प्रणालियों को विकासशील देशों के लिए उपलब्ध कराना।

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गुटेरेस ने कहा, “आज, दुनिया के एक तिहाई लोग, मुख्य रूप से कम विकसित देशों और छोटे द्वीप विकासशील राज्यों में, अभी भी प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली से दूर हैं। अफ्रीका में तो हालत और भी बुरी है और वहाँ 60% लोगों के पास ऐसे कवरेज की कमी है।”

वो आगे कहते हैं, “बदतर होते जलवायु प्रभावों को देखते हुए, यह अस्वीकार्य है। हमें अब अर्लि वार्निंग सिस्टम की ताकत हर किसी तक पहुंचानी होगी जिससे सबकी कार्य क्षमता बेहतर हो सके।”

अपनी बात समझाते हुए वो बोले, “मानव जनित जलवायु व्यवधान अब हर क्षेत्र को नुकसान पहुँचा रहा है। इंटरगवर्नमेंटल पैनल ऑन क्लाइमेट चेंज की सबसे हालिया रिपोर्ट पहले से हो रही पीड़ा का विवरण देती है। ग्लोबल वार्मिंग की प्रत्येक वृद्धि चरम मौसम की घटनाओं की आवृत्ति और तीव्रता को और बढ़ाएगी। इसी वजह से अर्ली वार्निंग सिस्टम प्रासंगिक बन जाते हैं।”

दरअसल अर्ली वार्निंग सिस्टम्स ऐसी प्रारंभिक चेतावनी प्रणालियां होती हैं जो आने वाली मौसम की घटनाओं की भविष्यवाणी करने में मदद करती हैं। ऐसा करने के लिए यह सिस्टम समुद्र और जमीन पर वास्तविक समय की वायुमंडलीय स्थितियों की निगरानी करता है।

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ऐसी प्रणालियों के उपयोग का विस्तार करना ज़रूरी हो गया है क्योंकि फैसले लेने का समय अधिक मिल जाता है इन प्रणालियों की मदद से।

पिछले साल जारी किए गए आपदा के आंकड़ों पर विश्व मौसम विज्ञान संगठन की एक रिपोर्ट से पता चला है कि पिछली आधी सदी में, जलवायु या पानी से संबंधित आपदा प्रतिदिन औसतन होती है, जिसके परिणामस्वरूप औसतन 115 मौतें होती हैं और एक दिन में $202 मिलियन का नुकसान होता है।

संयुक्त राष्ट्र, उसके सहयोगी और कई सरकारें वैश्विक तापमान वृद्धि को 1.5 डिग्री सेल्सियस (2.7 डिग्री फ़ारेनहाइट) तक सीमित करने के तेजी से बढ़ते लक्ष्य तक पहुँचने का प्रयास कर रही हैं।

गुटेरेस ने संयुक्त राष्ट्र की मौसम एजेंसी WMO को नवंबर में मिस्र में होने वाले अगले संयुक्त राष्ट्र जलवायु सम्मेलन तक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली पर एक “कार्य योजना” को आगे बढ़ाने का निर्देश दिया है।

WMO ने अपने कुछ मौजूदा कार्यक्रमों जैसे उष्णकटिबंधीय चक्रवातों, बाढ़ और तटीय बाढ़ जैसे खतरों के लिए एक बहु-खतरा चेतावनी प्रणाली के साथ-साथ एक प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली बनाने की योजना बनाई है जो लोगों को कुछ प्रकार की आपदाओं के जोखिम के बारे में सूचित करने में मदद करती है।

नैरोबी स्थित थिंक टैंक पावर शिफ्ट अफ्रीका के निदेशक मोहम्मद अडो ने कहा कि यह “सरहनीय” है कि अफ्रीका में लोगों को प्रारंभिक चेतावनी प्रणाली से सुरक्षा मिल रही है, लेकिन यह काम यहीं नहीं रुकना चाहिए।

एडो ने कहा, “शुरुआती चेतावनी प्रणालियां लोगों की जान बचाने के लिए महत्वपूर्ण हैं, लेकिन हमें केवल मौतों को रोकने पर ही नहीं रुकना चाहिए।”

उन्होंने कहा, “वैश्विक समुदाय को यह सुनिश्चित करने की जरूरत है कि जलवायु आपदाओं के शिकार लोगों को जीवित रहने के लिए नहीं, बल्कि पनपने में मदद की जाए।”

Mohan Joshi - Editor - Uttarakhand Morning Post
Mohan Chandra Joshi

मोहन चंद्र जोशी, नैनीताल (उत्तराखंड) के मान्यता प्राप्त वरिष्ठ पत्रकार एवं उत्तराखंड मॉर्निंग पोस्ट के संपादक हैं। उन्हें पत्रकारिता के क्षेत्र में 26 वर्षों का अनुभव है और वे निष्पक्ष व जनहितकारी पत्रकारिता के लिए जाने जाते हैं।

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Tags: Climate IPCC रिपोर्ट में वैज्ञानिक बताएंगे Latest News uttarakhand braking Uttarakhand Morning post.com Uttarakhand News खास खबर: वातावरण से कार्बन कैसे हटायेंगे देवभूमि उत्तराखंड

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