गुरु का दिल दुखाने वालों को तीनों लोकों में कहीं नहीं मिलता सहारा: सत्य साधक
नैनीताल में गुरु-शिष्य परंपरा पर गूंजा संदेश, गुरु के सम्मान और समर्पण पर विशेष जोर
नैनीताल। जय मां पीतांबरी साधना एवं दिव्य योग ट्रस्ट के संस्थापक सत्य साधक श्री विजेंद्र पांडे गुरुजी ने भक्तजनों को संबोधित करते हुए गुरु-शिष्य संबंध की गहराई और उसकी आध्यात्मिक महत्ता पर विस्तृत प्रवचन दिया। उन्होंने कहा कि गुरु और शिष्य का रिश्ता स्वार्थ से परे, पूर्ण समर्पण और विश्वास पर आधारित होता है, जिसमें गुरु अपने शिष्य के जीवन को संवारने के लिए हर संभव त्याग करता है। गुरुजी ने बताया कि एक सच्चा गुरु अपने शिष्य को हर संकट और विपदा से बचाने का प्रयास करता है और कई बार उसके कष्टों को स्वयं पर लेकर उसे जीवन में आगे बढ़ने की शक्ति देता है, ताकि शिष्य का जीवन सुखमय और संतुलित बना रहे।
अपने प्रवचन में गुरुजी ने उदाहरण देते हुए कहा कि जिस प्रकार एक मिस्त्री अनेक बहुमंजिला भवनों का निर्माण करता है, लेकिन स्वयं के लिए एक छोटा सा घर भी नहीं बना पाता, फिर भी अपने कार्य से संतुष्ट रहता है, उसी प्रकार गुरु भी चाहे कितनी ही विषम परिस्थितियों में क्यों न हो, वह अपने शिष्य को ऊंचाइयों पर पहुंचते देखकर प्रसन्न होता है। उन्होंने कहा कि गुरु का हृदय अत्यंत संवेदनशील होता है और जब कोई शिष्य उसका अनादर करता है, तो यह गुरु के लिए गहरी पीड़ा का कारण बनता है।
गुरुजी ने संत कबीर दास के दोहों का उल्लेख करते हुए गुरु की महिमा को स्पष्ट किया। उन्होंने कहा— “कबिरा हरि के रूठते, गुरु के सरने जाय, कह कबीर गुरु रूठते, हरि नहिं होत सहाय” — अर्थात यदि भगवान रूठ जाएं तो गुरु की शरण में जाकर मार्ग मिल सकता है, लेकिन यदि गुरु ही रुष्ट हो जाए तो फिर कहीं भी सहारा नहीं मिलता। इसी क्रम में उन्होंने दूसरा दोहा सुनाया— “कबीरा ते नर अन्ध है, गुरु को कहते और, हरि रूठे गुरु ठौर है, गुरु रुठै नहीं ठौर” — जिसका अर्थ है कि जो व्यक्ति गुरु के महत्व को नहीं समझता, वह नेत्र होते हुए भी अंधा है। यदि ईश्वर नाराज हों तो गुरु मार्ग दिखा सकते हैं, लेकिन यदि गुरु ही साथ छोड़ दें तो जीवन में कोई सहारा शेष नहीं रहता।
गुरुजी ने भक्तों से आह्वान किया कि वे अपने जीवन में गुरु के प्रति श्रद्धा, सम्मान और विश्वास बनाए रखें, क्योंकि गुरु ही जीवन के अंधकार को दूर कर सही दिशा दिखाने वाला प्रकाश होता है। प्रवचन के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु उपस्थित रहे और सभी ने गुरुजी के विचारों को आत्मसात करने का संकल्प लिया।
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